Vijay Goel

नौजवान हैं, लेकिन प्रेरणा ग़ायब है

विजय गोयल
(लेखक बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और पीएमओ में मंत्री रह चुके हैं)
 
मौजूदा दौर में भारत युवाओं का देश है, यह सच्चाई है। देश में 35 साल की उम्र वालों की संख्या आबादी के 60 फ़ीसदी से ज़्यादा है। यह सुनकर अच्छा तो लगता है, लेकिन फिर एक झटके से विचार आता है कि इतनी संख्या में नौजवान होने के बावजूद देश में उसी हिसाब से ऊर्जा क्यों हमें क्यों महसूस नहीं होती? मेरा यह विचार किसी को नकारात्मक लग सकता है, लेकिन चिंता की बात यह है कि युवाओं को दिशा देने वाले लोगों की संख्या दिन-ब-दिन घटती जा रही है, यह भी सच्चाई है। यही वजह है कि देश में युवाओं की बड़ी संख्या होने के बावजूद नौजवानों जैसा जोश दिखाई नहीं देता।
 
हाल ही में 15 अगस्त गुज़रा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से देश को संबोधित किया। उनके डेढ़ घंटे के भाषण में ऊर्जा ही ऊर्जा नज़र आई, लेकिन स्वतंत्रता दिवस की उमंग मुझे दिल्ली में उतनी नहीं नज़र आई, जितनी तब होती थी, जब हम नौजवान थे। न्यूज़ टेलीविज़न चैनलों में दूसरे राज्यों की तस्वीरें भी निराश करती नज़र आईं। ऐसे में सवाल यह है कि हम दिशाहीन भीड़ से देश के विकास की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? लिहाज़ा मेरा मानना है कि नौजवान देश होना गर्व की बात तो है, लेकिन साथ-साथ बड़ी चिंता की बात भी है। अगर 60 फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी को दिशा देने वाले, प्रेरणा देने वाले ही नहीं होंगे, तब सोचिए धीरे-धीरे ही सही देश का क्या हाल होगा? चिंता तब और बढ़ जाती है, जब हम देख रहे हैं कि जैसे-जैसे देश युवा हो रहा है, उन्हें प्रेरणा देने वाले कम होते जा रहे हैं।
 
असीम संभावनाओं से भरी मिट्टी से मनोहारी प्रतिमाएं या कोई और वस्तु बनाने के लिए हमारे पास अच्छे सांचे होने ज़रूरी हैं। मिट्टी को गीला करने भर से ही मनचाही आकृतियां नहीं बन जातीं। मनचाही आकृति बनाने के क्रम में मिट्टी तो केवल ज़रिया होती है। या यह भी कह सकते हैं कि मुख्य आधार होती है, लेकिन उसे हम कच्चा माल ही कहेंगे। असल में मनचाही आकृति बनाने के लिए किसी कलाकार के मन में कोई विचार ही होता है। वह सधे हाथों से अपने मन में उकेरी गई प्रतिमा को आकार देता है। सीधे शब्दों में कहें, तो मिट्टी के मनचाहे आकार बनाने के लिए प्रेरणा देने का काम कलाकार करता है। लेकिन विडंबना यह है कि मिट्टी की प्रतिमाएं, बर्तन और दूसरे सामान का प्रचलन नए दौर में ख़त्म होता जा रहा है। न घर में कोई घड़े रखता है, न सुराही और न दूसरी चीज़ें। इसी तरह नौजवानों को प्रेरणा देने वाले तबके की पूछ भी ख़त्म होती जा रही है। जो हैं, उन्होंने ख़ुद को अलग-थलग कर लिया है। चिंता की बात यही है कि जब नौजवानों को देश के सतर्क नागरिकों के लिए ज़रूरी दीक्षा ही नहीं मिलेगी, तो भविष्य का देश कैसा होगा? जब नींव ही कमज़ोर होगी, तो मकान के स्थायित्व को लेकर क्या गारंटी दी जा सकती है?
 
आज़ादी की लड़ाई के दौरान देश में कितने क्षमतावान नेता थे, सब जानते हैं। लेकिन आज क्या हाल है, ग़ौर से सोचिए। आज चुनावों के दौरान आगे करने के लिए पार्टियों के पास नाम नहीं हैं। क्षेत्रीय पार्टियां तो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह चल ही रही हैं, बड़ी पार्टियों के पास भी अच्छी छवि के लोग तो बहुत होंगे, लेकिन जन-साधारण को स्वीकार्य नेताओं की संख्या कितनी है?  आज मैं राष्ट्रपति पद के बारे में सोचता हूं, तो ऐसे पांच-छह नाम नहीं मिलेंगे, जिनपर आंख मूंद कर आम सहमति हो पाए। हर किसी के साथ कुछ न कुछ अड़ंगा लगा ही हुआ है। आज़ादी के सात दशक बाद ही हमारे देश में नेताओं का अकाल पड़ने लगा है।
 
यह गंभीर बात है। किसी भी देश की अपनी संस्कृति होती है, अपने आचार-विचार होते हैं। आज हमारे देश में 35 साल उम्र के लोगों की संख्या 60 फ़ीसदी से ज़्यादा है, तो ज़ाहिर है कि ऐसा हमारी किसी दूरगामी योजना की वजह से नहीं हुआ है। यह स्थिति बहुत सी सामाजिक अवस्थाओं, बढ़ती साक्षरता और स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए सुधारों का ही नतीजा है। जो भी हो, लेकिन यह आज की सबसे बड़ी हक़ीक़त तो है ही।
 
दुर्भाग्य की स्थिति है कि हम उतनी ही ताक़त से प्रेरणा देने वाले तैयार नहीं कर पाए। यह वैसी ही स्थिति है कि स्कूल में पढ़ने की इच्छा रखने वाले बच्चे तो हैं, लेकिन पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं हैं। अब सवाल यह आता है कि इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कौन है? मेरी सियासी चेतना तो यही कहती है कि इसके लिए वही ज़िम्मेदार है, जिसने देश पर ज़्यादातर शासन किया है। विकास करते वक़्त हमें दूररगामी योजनाएं बनानी चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि आबादी किस अनुपात में बढ़ रही है। उसी अनुपात में हमें बुनियादी ढांचे का विकास भी करना चाहिए।
 
लेकिन ऐसा नहीं किया गया और अनियंत्रित विकास अब बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। यही हालत समाज की भी है। सामाजिक मूल्यों, देश की संस्कृति को बनाए रखने के लिए कुछ नहीं किया गया। लिहाज़ा समाज विकसित तो हुआ है, लेकिन यह विकास भौतिक आकार में ही है, आध्यात्मिक चिंतन के रूप में बहुत कम।
 
अपने जीवन और आचरण के ज़रिए आदर्श प्रस्तुत करने वाले आज कितने हैं। नई पीढ़ी समझदार है और वह जानती है कि भाषणों से आदर्श प्रस्तुत नहीं किए जा सकते। समाज में, सियासी दलों में, साधु-संतों में सभी ओर एक निराशा छा रही है। समारोहों में बुलाने के लिए ऐसे लोग ही नहीं मिलते, जो आदर्श की मिसाल के तौर पर लिए जा सकें। यही वजह है कि जगह-जगह सामाजिक समारोहों में नेता और अभिनेता ही दिखाई देते हैं। लोग टीवी स्टार्स को बुलाते हैं। ऐसे नेताओं को भी बुलाया जाता है, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हों। चिंता की बात यह है कि लोग आरोपी नेताओं को बुलाकर भी ख़ुद को गौरवान्वित समझते हैं।
 
मोहल्ले में ख़ुद के रसूखदार होने का ढोल पीटते हैं। मुझे लगता है कि ऐसा नहीं है कि प्रेरणादायी व्यक्तित्व देश में हैं ही नहीं। मैं ऐसे कई महान व्यक्तित्व वाले सज्जनों को जानता हूं, जो अपना प्रचार-प्रसार करते ही नहीं। वे सिमट कर रहते हैं। यहीं पर देश के मीडिया की भूमिका आती है। मीडिया को ऐसे लोगों को सामने लाना चाहिए, लेकिन ऐसा वह नहीं कर रहा। मीडिया केवल नकारात्मक ख़बरों को तवज्जो दे रहा है। यह चिंता की बात है। हालांकि तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक हो, ऐसा भी नहीं है। काम तो हो रहा है, योजनाबद्ध तरीक़े से नहीं हो रहा है। कई साल पहले मुझे बड़ा अच्छा लगा कि महान शहीद भगत सिंह को लेकर तीन फिल्में आई। देश की आज़ादी के सिपाहियों और दूसरी बहुत सी महान हस्तियों की जीवनियों पर ज़्यादा से ज़्यादा फिल्में बननी चाहिए।
 
हम अपनी संस्कृति को भूलने की वजह से ऐसे नायकों को हाईलाइट नहीं कर रहे हैं। उनकी प्रतिमाएं बनाकर और उन पर फूल चढ़ा कर हम अपने कर्तव्यों की खानापूरी कर लेते हैं।
 
हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं, लेकिन बुझे मन से कहना पड़ रहा है कि सियासत में विचार की अहमियत ही ख़त्म हो गई है। लेकिन याद रखिए देश का आम आदमी उस हस्ती को ही याद रखता है, जो क़ुर्बानी देता है। क़ुर्बानी देने का मतलब यह नहीं कि जान ही दी जाए। क़ुर्बानी का मतलब है अपने लिए नहीं, समाज के लिए काम करना। अपना विकास नहीं, समाज का विकास करना। आज लोग रानी लक्ष्मी बाई को याद करते हैं, तो सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने खुले मैदान में अंग्रेज़ों से लोहा लिया। अपना बच्चा क़ुर्बान कर दिया और ख़ुद भी शहीद हो गईं। आज लोग महाराणा प्रताप को याद करते हैं, तो इसलिए कि अपने राज्य की रक्षा के लिए उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया, घास की रोटियां खाईं। सवाल यह भी है कि समाज क़ुर्बानी की उम्मीद किससे करता है। ज़ाहिर है कि उससे तो नहीं, जिसके पास कुछ क़ुर्बान करने के लिए हो ही नहीं। क़ुर्बानी उसे करनी पड़ती है, जो समृद्ध हो। लेकिन हमारी सियासत में अब यह सोच ख़त्म होती जा रही है।
 
नामचीन साधु-संत दवाएं बेचने में लगे हैं या कसरत के गुर बेच रहे हैं। तो आदमी का क्या होगा?  
 
आम लोगों की सियासी चेतना भी मंद पड़ी है। मुझे याद है कि दिल्ली के चांदनी चौक में मुझे गांधी–नेहरू, पटेल-सुभाष की प्रतिमाएं घरों के मुख्य द्वारों पर नज़र आ जाती थीं। पत्थर की प्रतिमाएं लोग मुख्य द्वारों पर लगाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। लोग बड़े पैमाने पर नए घर तो बना रहे हैं, लेकिन उनमें प्रेरणा देने वाले महापुरुषों और देवी देवताओं का केवल औपचारिक स्थान है। चार गुणा चार फुट की जगह में मंदिर सिमट गए हैं। पहले पूरा घर मंदिर होता था। अब तो सीढ़ियों के नीचे बची फ़ालतू जगह पर मंदिर बनने लगे हैं। आप अयोध्या जाइए, बनारस जाइए। पुरानी बस्तियों में कमरों से बड़े मंदिर बनाए जाते थे। अब ऐसा नहीं है। तो प्रेरणा कहां से मिलेगी।
 
सवाल यह है कि बदलते वक़्त में अपनी संस्कृति को अगर हमने नए और आसान
तरीक़े से नहीं परोसा, तो देश की कैसी सूरत बनने वाली है, यह सोचना मुश्किन नहीं है। बाबाओं ने अपने प्रवचनों को संगीत के साथ जोड़ा, तो ज्यादा लोग उनके पास आने लगे। ऐसी चीज़ें समाज में की जानी चाहिए, जिनसे लोग प्रेरित हों।
 
मैं बड़ी दृढ़ता से मानता हूं कि नई पीढ़ी के सामने हमें अपने महापुरुषों से जुड़ी अच्छी बातें ही रखनी चाहिए। आज के ऐतिहासिक-धार्मिक टीवी सीरियल तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। वे ऐसे-ऐसे प्रसंग दिखा रहे हैं, जिनसे महापुरुषों का चरित्र हनन होता है। गांधी-नेहरू के वे प्रसंग सामने नहीं लाए जाने चाहिए, जिनसे उनके प्रति स्वीकृति का भाव ख़त्म हो। हमें अपने बच्चों को अच्छी चीज़ें दिखानी चाहिए। 
 
ये हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि हम नई पीढ़ी को स्किल्ड तो बना दें, लेकिन संस्कारवान न बना पाएं। हमारे ऐसे युवा विदेश जाएंगे, तो देश की क्या छवि बनेगी? दिक्क़त यही है कि नेता केवल भाषण दे रहे हैं और बाबा केवल प्रवचन। वे अपनी नसीहतों पर ख़ुद भी अमल नहीं करते। पहले महापुरुषों की नसीहतें इसलिए लोगों पर असर डालती थीं, क्योंकि वे ख़ुद उन्हें अमल में लाते थे। गांधी जी ने गुड़ खाना छोड़कर ही एक बच्चे से ऐसा करने को कहा।
 
पहले देश बनाना होगा और इसके लिए बहुत से स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। मोदी सरकार ने यह मुहिम शुरू की है, लेकिन कामयाबी तभी मिलेगी, जब आम लोग पूरे मन से इसमें जुड़ें।
 
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